मुश्ताक़ खान भाई को अरुण नगर की भावपूर्ण श्रद्धांजलि
कुछ रिश्ते वक्त के साथ पुराने नहीं होते… बल्कि वक्त गुजरने के साथ और गहरे होते जाते हैं। “कल जब मुश्ताक खान भाई के इंतकाल की खबर मिली, तो यकीन मानिए, बीते 14 साल की न जाने कितनी यादें एक पल में मेरी आंखों के सामने ताजा हो उठीं।” साल 2012 का वो दौर था। मैंने अपनी पहली फिल्म “गुर्जर आंदोलन” का निर्देशन किया था। पहली फिल्म थी, मैं एक नया निर्देशक था और मेरे पास बहुत सीमित साधन थे। उस वक्त फिल्म बनाना अपने आप में एक बहुत बड़ा संघर्ष था।
मैंने जब अपनी परेशानी मुश्ताक भाई से साझा की, तो उन्होंने सिर्फ मेरी बात सुनी नहीं, बल्कि मेरा साथ दिया। उन्होंने मेरी फिल्म के लिए अपने तय मेहनताने से बहुत कम पैसे लिए, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह चाहते थे कि मेरी पहली फिल्म पूरी हो और मैं आगे बढ़ूं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी खूबसूरती सिर्फ इतनी नहीं थी। उन्होंने मुझसे एक बात कही थी, जो आज भी मेरे कानों में वैसे ही गूंज रही है— “अरुण, तुम ये मत सोचना कि मैं तुमसे कम पैसे ले रहा हूं, तो तुम्हारी फिल्म में कम अभिनय करूंगा या कम ऊर्जा दूंगा। नहीं। जितनी ऊर्जा से मैं अक्षय के साथ ‘वेलकम’ में काम करता हूं, उतनी ही ऊर्जा से तुम्हारी कम बजट वाली फिल्म में भी काम करूंगा। लोगों को थोड़ी पता है कि मैंने तुमसे कम पैसे लिए हैं… लोगों को तो सिर्फ मेरा अभिनय दिखाई देगा। जब वो मुश्ताक खान को देखें, तो एक बेहतरीन अभिनेता के तौर पर याद करें।”
और उन्होंने वही किया। “गुर्जर आंदोलन” में उनके द्वारा निभाया गया “मनोहर गुर्जर” का किरदार आज भी मेरे लिए उस फिल्म की सबसे खास यादों में से एक है। उनकी हास्य-प्रस्तुति, उनकी ऊर्जा और उनका अंदाज़… उन्होंने उस किरदार में ऐसी जान डाल दी कि वह मेरी फिल्म की सबसे बड़ी खासियत बन गया। लेकिन मुश्ताक भाई के साथ मेरा रिश्ता सिर्फ फिल्म के पर्दे और काम तक सीमित नहीं रहा। शायद यही वजह है कि उनका जाना मेरे लिए और भी ज्यादा व्यक्तिगत और तकलीफदेह है। मेरी फिल्म की शूटिंग मेरे अपने गांव दुजाना, ग्रेटर नोएडा, तहसील दादरी, जिला गौतम बुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश में हुई थी। मुश्ताक भाई ने गांव दुजाना में करीब पांच दिनों तक फिल्म की शूटिंग की थी और इन पांच दिनों में वह जिस तरह पूरे गांव के लोगों से घुल-मिल गए थे, ऐसा लगता ही नहीं था कि वह बाहर से आए हुए कोई कलाकार हैं। ऐसा लगता था जैसे वह इसी गांव के अपने आदमी हों। उस समय तत्कालीन ग्राम प्रधान स्वर्गीय ओमपाल नागर जी के घर पर ही उनका ठिकाना हुआ करता था। घर का बना हुआ खाना उन्हें बड़े प्रेम और आत्मीयता से परोसा जाता था और वह भी बड़े चाव से उसे खाते थे।
वह अक्सर इस प्यार और सत्कार की चर्चा करते हुए कहते थे— “बड़ी-बड़ी फिल्मों में भी ऐसा प्यार नसीब नहीं होता, जैसा अरुण, तुम्हारी फिल्म में हमको नसीब हुआ है। ऐसा आदर-सम्मान बहुत कम देखने को मिलता है, जहां पूरा गांव हमारे सत्कार में लगा हुआ है।” उनके लिए वो सिर्फ फिल्म की शूटिंग नहीं थी, बल्कि गांव के लोगों के साथ बिताए हुए कुछ बेहद खूबसूरत दिन थे। और हमारे लिए भी मुश्ताक भाई का हमारे बीच होना किसी अपने के आने जैसा था।
दुजाना गांव में अंग्रेजों के समय की बनी हुई एक पुरानी “कोठी” पर भी हमने फिल्म की शूटिंग की थी। उस ऐतिहासिक इमारत को देखकर मुश्ताक भाई भी काफी हैरान हुए थे। उन्हें इस बात का बहुत कौतूहल था कि इतने पुराने इतिहास और विरासत से जुड़ी ऐसी जगह हमारे गांव दुजाना में मौजूद है। जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस समय हमें शायद अंदाज़ा भी नहीं था कि ये छोटे-छोटे पल आने वाले वर्षों में इतनी बड़ी यादें बन जाएंगे।
फिल्म के दौरान उनका अभिनय… गांव में लोगों के साथ उनका घुलना-मिलना… स्वर्गीय ओमपाल प्रधान जी के घर का खाना… गांव वालों का प्यार… और उनके साथ बिताए हुए वो पांच दिन…आज इन सबको याद करता हूं तो मन भारी हो जाता है। आज उस बात को करीब 14 साल गुजर चुके हैं। लेकिन सच कहूं तो ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो।
कल से उनके जाने की खबर के बाद से उनकी कही हुई बातें बार-बार जेहन में घूम रही हैं। जाना तो एक दिन हम सबको है… लेकिन कुछ लोगों का चले जाना इसलिए ज्यादा तकलीफ देता है क्योंकि उनके साथ सिर्फ एक इंसान नहीं जाता, उनके साथ हमारी जिंदगी का एक खूबसूरत हिस्सा भी चला जाता है। पीछे बस यादें रह जाती हैं… अच्छी भी, भावुक भी और कभी-कभी आंखें नम कर देने वाली भी।
मुश्ताक भाई, आपने मेरी पहली फिल्म में सिर्फ अभिनय ही नहीं किया था… आपने एक युवा निर्देशक का हौसला बढ़ाया था। आपने मेरे संघर्ष के समय मेरा साथ दिया था। आपने मेरी फिल्म को अपना समय, अपनी ऊर्जा और अपना बेहतरीन अभिनय दिया था। और उससे भी बढ़कर, आपने मुझे और मेरे गांव के लोगों को अपना प्यार और अपनापन दिया था। आपकी वह मदद, आपका वह विश्वास और आपके साथ बिताए वो पांच दिन मैं जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा। “गुर्जर आंदोलन” मेरे जीवन की पहली फिल्म थी, लेकिन उसमें आपकी मौजूदगी ने उस सफर को मेरे लिए हमेशा के लिए खास बना दिया। कुल मिलाकर बस यादें ही शेष रह गई हैं… और कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें इंसान जिंदगी भर अपने साथ लेकर चलता है। ईश्वर मुश्ताक भाई की आत्मा को शांति प्रदान करे और उन्हें जन्नत नसीब हो। उनके परिवार को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति और संबल प्रदान करे। अलविदा मुश्ताक भाई…आपकी हंसी, आपका अभिनय, आपका अपनापन और मेरे दुजाना गाँव में बिताए वो पांच दिन हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेंगे।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि। अरुण नागर (फ़िल्म ऐक्टर एवं निर्देशक)




